नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सिंधु जल विवाद में नया मोड़ आया है। हेग स्थित Permanent Court of Arbitration की कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने पाकिस्तान के पक्ष में फैसला देते हुए कहा है कि 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) पूरी तरह लागू है। भारत ने अप्रैल 2025 में संधि को 'abeyance' में रखने का फैसला किया था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस कदम को मानने से इनकार कर दिया।
पाकिस्तान की बड़ी मांग पर क्या हुआ?
पाकिस्तान ने तर्क दिया था कि भारत संधि को एकतरफा तरीके से निलंबित नहीं कर सकता। PCA ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि संधि के तहत दोनों देशों की जिम्मेदारियां जारी रहती हैं।
यह मामला खास तौर पर पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—पर भारत की हाइड्रोपावर परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से जुड़े विवादों पर केंद्रित है।
रतले प्रोजेक्ट पर भी झटका?
PCA ने पाकिस्तान की अंतरिम राहत की मांग पर रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अस्थायी पाबंदी लगाई है।
भारत को रतले बांध की दीवार और पावर इनटेक स्ट्रक्चर को कुछ निर्धारित स्तर से ऊपर कंक्रीट करने से फिलहाल रोका गया है। यह प्रतिबंध तब तक लागू रहेगा जब तक Neutral Expert की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। इस विशेषज्ञ का फैसला जुलाई 2027 के आसपास आने की उम्मीद है।
लेकिन भारत ने फैसला मानने से किया इनकार
भारत का रुख बिल्कुल अलग है। विदेश मंत्रालय ने PCA के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि यह अदालत 'अवैध रूप से गठित' है और भारत ने इसकी कार्यवाही में हिस्सा ही नहीं लिया है।
भारत का कहना है कि इस कोर्ट को भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसलिए नई दिल्ली के मुताबिक इस फैसले का भारत की परियोजनाओं या उसके कार्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
भारत पर वास्तविक असर क्या होगा?
1. पानी तुरंत बंद या चालू नहीं होगा
इस फैसले से भारत-पाकिस्तान के बीच नदियों का पानी तुरंत बदल जाने जैसी स्थिति नहीं बनती। विवाद मुख्य रूप से संधि की कानूनी स्थिति और हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़ा है।
2. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर दबाव बढ़ सकता है
रतले जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर कानूनी और कूटनीतिक विवाद बढ़ सकता है। खासकर पश्चिमी नदियों पर भारत की परियोजनाओं की डिजाइन और जल भंडारण क्षमता महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रहेगी।
3. भारत-पाकिस्तान तनाव और बढ़ सकता है
भारत फैसले को मान्यता नहीं देता, जबकि पाकिस्तान इसे अपने पक्ष की बड़ी कूटनीतिक और कानूनी जीत मान रहा है। इससे दोनों देशों के बीच पानी को लेकर तनाव और बढ़ने की संभावना है।
4. संधि की 'abeyance' पर असली टकराव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत द्वारा संधि को 'abeyance' में रखने का फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्य है या नहीं। PCA ने इसे स्वीकार नहीं किया, जबकि भारत अपने फैसले पर कायम है।
1960 में हुई थी सिंधु जल संधि
सिंधु जल संधि 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इसके तहत तीन पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत के लिए और तीन पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं। हालांकि पश्चिमी नदियों पर भारत को संधि में तय सीमाओं के भीतर कुछ उपयोग और हाइड्रोपावर परियोजनाओं की अनुमति है।
तो क्या पाकिस्तान जीत गया?
कानूनी मंच पर पाकिस्तान को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन जमीन पर इसका असर सीमित और विवादित है।
PCA ने अपना फैसला दे दिया है, लेकिन भारत इस ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं करता। इसलिए भारत और PCA के बीच फैसले की वैधता को लेकर मूलभूत मतभेद बना हुआ है।
यानी आने वाले समय में सिंधु जल संधि, रतले प्रोजेक्ट और भारत-पाकिस्तान के जल विवाद पर कानूनी और कूटनीतिक लड़ाई और तेज हो सकती है।